इतिहास

झज्जर की भूमि प्रारंभिक निवास के संकेत दिखाती है। यहां विभिन्न ऐतिहासिक इमारतों को देखा जा सकता है। 119 1 ईस्वी के दौरान जब गोरी और राजा पृथ्वी राज के बीच युद्ध हुआ तब तक झज्जर का क्षेत्र विकास नहीं हुआ था और वहां सिर्फ जंगल था। पूर्वी हिस्से में मालोकन नाम से एक शहर था जहां जाट रहते थे और युद्ध के कारण यह क्षेत्र सबसे खराब प्रभावित क्षेत्रों में से एक था। वहां रहने वाले अधिकांश लोग युद्ध के बाद विभिन्न स्थानों पर स्थानांतरित हो गए। छज्जू जाट जो गांव के निवासी थे, ने अपील की ताकि गांव का पुनर्वास किया जाएं। हालांकि गोरी ने इस अपील को खारिज कर दिया था। उन्होंने आदेश दिया कि गांव को कहीं और पुनर्वास किया जाना चाहिए। इसलिए, मलकान के जाट झज्जर शहर में रहने आए। इसे स्थापित करने के बाद, झज्जर शहर को कई शासकों जैसे मुगल शासकों, मुस्लिम शासकों और अंग्रेजों के हाथों में बहुत से राजनीतिक अशांति से गुजरना पड़ा। जबकि कई लोग कहते हैं कि शहर ने संस्थापक यानी छज्जू से इसका नाम लिया, जिसे बाद में झज्जर में बदल दिया गया, कई अन्य लोगों का यह भी विचार है कि यह झारनगर नाम से प्राकृतिक फव्वारे से लिया गया था। यह 15 जुलाई 1997 तक यह रोहतक जिले का हिस्सा था, जिसे बाद में इससे अलग किया गया।

झज्जर की संस्कृति

हरियाणा का हिस्सा झज्जर, की संस्कृति पंजाबी और हरियाणवी संस्कृति का मिश्रण है। यहां हरियाणवी के साथ-साथ पंजाबी त्यौहार समान उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। कई लोगों द्वारा योग, ध्यान और वैदिक मंत्रों के रीति-रिवाजों को देखा जाता है। इस क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा “जटु” या “हरियाणवी” है। यद्यपि भाषा को कई लोगों द्वारा कठोर माना जाता है, हालांकि, यह ईमानदारी और सरल हास्य से भरा है। झज्जर के लोग बसंत पंचमी, लोहड़ी, गंगोर, होली, तेज, गुड्डा नौमी, जन्माष्टमी, दिवाली और दुशेरा जैसे विभिन्न त्यौहार मनाते हैं। लोक नृत्य, लोक संगीत और लोकगीत झज्जर की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। गीत की प्रकृति ज्यादातर शास्त्रीय होती हैं और उनमें से अधिकतर वर्ष के विभिन्न समय पर आयोजित विभिन्न त्यौहारों में गाए जाते हैं। जोगिस, भट्ट और सैंगिस ने लोक संगीत को झज्जर और हरियाणा के अन्य हिस्सों में भी लोकप्रिय बनाने के लिए पहल की है। विभिन्न त्यौहार के दौरान पारंपरिक लोक नृत्य भी इस क्षेत्र की महिला और पुरुष आबादी द्वारा किया जाता है।